रांची: झारखंड आंदोलन के इतिहास में कई नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज हैं, लेकिन पूर्व जस्टिस एल.पी.एन. शाहदेव का व्यक्तित्व सबसे अलग रहा। वे केवल एक कानूनविद् नहीं थे, बल्कि उस आंदोलन की ‘बौद्धिक रीढ़’ थे, जिसने झारखंड को एक अलग राज्य की पहचान दिलाई। आज उनकी पुण्यतिथि पर राज्य उन्हें नमन कर रहा है।
आंदोलन को दी बौद्धिक और कानूनी दिशा
90 के दशक के उत्तरार्ध में जब झारखंड आंदोलन अपने निर्णायक मोड़ पर था, तब आंदोलन को एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी जो इसे वैचारिक और कानूनी मजबूती दे सके। जस्टिस शाहदेव ने उस समय एक साहसी कदम उठाया। एक संपन्न जमींदार परिवार में जन्मे और उच्च न्यायिक पद पर आसीन होने के बावजूद, उन्होंने अपनी माटी की पुकार सुनी।
“हमें झुनझुना नहीं, अलग राज्य चाहिए”
1998-99 के दौरान जब केंद्र सरकार ने झारखंड स्वाशासी परिषद (JAC) का गठन किया था, तब कई नेता संतुष्ट थे। लेकिन जस्टिस शाहदेव ने इसे ‘लॉलीपॉप’ करार दिया। उन्होंने स्पष्ट संदेश दिया कि:
”हमें टुकड़ों में स्वायत्तता नहीं, बल्कि पूर्ण झारखंड राज्य चाहिए।”
कोर्ट रूम से जेल तक का सफर
जस्टिस शाहदेव केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहे। 21 सितंबर 1998 को जब ऐतिहासिक बंदी बुलाई गई, तो जो व्यक्ति कभी कोर्ट रूम में ‘योर लॉर्डशिप’ के संबोधन से नवाजा जाता था, वह अपने राज्य के लिए सड़क पर उतर आया। उनकी गिरफ्तारी हुई, लेकिन उनका जज्बा नहीं डगमगाया।
कानूनी तर्कों से सत्ता को घेरा
आंदोलन के दौरान जब भी तत्कालीन बिहार सरकार या केंद्र सरकार कानूनी अड़चनें पैदा करती थीं, जस्टिस शाहदेव अपने तर्कों से उन्हें निरुत्तर कर देते थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि संविधान और कानून एक अलग राज्य के गठन की पूरी अनुमति देते हैं, बस राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है।
युवाओं के मार्गदर्शक और शांत स्वभाव के धनी
जस्टिस शाहदेव की खासियत यह थी कि वे उग्र आंदोलन के बीच भी शांति और संयम की बात करते थे। उन्होंने आजसू (AJSU) के जोश से भरे युवाओं को हमेशा सही दिशा दिखाई और आंदोलन को भटकने से रोका।
आज का झारखंड और उनकी विरासत
आज झारखंड एक अलग राज्य के रूप में अपनी पहचान बना चुका है, लेकिन जस्टिस शाहदेव जैसे नायकों का योगदान हमेशा प्रासंगिक रहेगा। झारखंड के लोग उन्हें एक ऐसे महापुरुष के रूप में याद कर रहे हैं, जिन्होंने न्याय की कुर्सी से ज्यादा अपनी माटी के हक को प्राथमिकता दी।
