ईटकी: पारंपरिक उत्साह के साथ संपन्न हुआ तीन दिवसीय ‘विशु शिकार’, 52 गांवों के शिकारियों ने दिखाई एकजुटता

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"ईटकी के डोला टाड़ में विशु शिकार के समापन पर पारंपरिक हथियारों के साथ एकजुट हुए 52 गांवों के ग्रामीण और पड़हा प्रतिनिधि।"

रिपोर्ट- रवि सिंह

ईटकी (रांची): झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपरा का प्रतीक, पारंपरिक ऐतिहासिक तीन दिवसीय ‘विशु शिकार’ शुक्रवार को हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो गया। इस आयोजन ने न केवल पूर्वजों की परंपरा को जीवंत किया, बल्कि आदिवासी समाज की एकजुटता और सामाजिक अनुशासन का एक अनुपम उदाहरण भी पेश किया।

पारंपरिक हथियारों के साथ जंगल की ओर कूच

विशु शिकार की शुरुआत गुरुवार को हुई थी, जिसमें 12 पड़हा और 21 पड़हा के नेतृत्व में कुल 52 गांवों के ग्रामीण शामिल हुए। ढोल-नगाड़ों की थाप और पारंपरिक नारों के साथ शिकारी दल अपने पारंपरिक हरवे-हथियार (धनुष-बाण, टांगी, बलुआ) लेकर जंगलों की ओर निकले। दिनभर जंगल में शिकार करने के बाद, देर शाम यह विशाल दल ईटकी के डोला टाड़ पहुंचा, जहां रात्रि विश्राम और सामाजिक बैठक का आयोजन किया गया था।

‘पड़हा बैठक’ में गूंजे सामाजिक मुद्दे

डोला टाड़ में एकत्रित हुए हजारों शिकारियों और ग्रामीणों के बीच रात्रि में एक महत्वपूर्ण ‘पड़हा बैठक’ आयोजित की गई। इस बैठक की शुरुआत सभी गांवों के झंडों के साथ ‘हाजिरी’ लगाने से हुई। बैठक में केवल शिकार पर चर्चा नहीं हुई, बल्कि समाज को सशक्त बनाने के लिए कई गंभीर मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया:

  • सरना-मसना घेराबंदी: ग्रामीणों ने मांग रखी कि गांवों में स्थित पवित्र सरना और मसना स्थलों की सुरक्षा के लिए उनकी घेराबंदी की जाए, ताकि इन धार्मिक स्थलों का अस्तित्व बना रहे।
  • अंतरजातीय विवाह पर रोक: सामाजिक ताने-बाने और परंपराओं को अक्षुण्ण रखने के लिए अंतरजातीय विवाहों पर कड़ाई से रोक लगाने की बात कही गई।
  • एकता का संदेश: 12 पड़हा के राजा विशाल उरांव और 21 पड़हा के राजा महादेव कुजूर ने जोर देकर कहा कि आदिवासी समाज की शक्ति उसकी एकता में है। उन्होंने आह्वान किया कि आधुनिकता के दौर में भी हमें अपनी पड़हा परंपरा को जीवित रखना है।

सामुदायिक भोज और सामूहिक निर्णय

रात्रि के समय डोला टाड़ का दृश्य अद्भुत था। जंगल से प्राप्त शिकार और ग्रामीणों के सहयोग से लाए गए राशन से अलग-अलग चूल्हों पर भोजन तैयार किया गया। सभी ने एक साथ बैठकर सामुदायिक भोज किया और रात्रि विश्राम वहीं खुले आसमान के नीचे किया। बैठक में यह निर्णय लिया गया कि समाज और गांव की जो भी समस्याएं होंगी, उन्हें आपसी सहयोग और पड़हा व्यवस्था के माध्यम से ही सुलझाया जाएगा।

विदाई और अपने गांवों की ओर प्रस्थान

शुक्रवार सुबह होते ही डोला टाड़ में फिर से हलचल बढ़ गई। सभी 52 गांवों के शिकारी दलों ने अपने-अपने पारंपरिक साजो-सामान के साथ प्रस्थान किया। लौटते समय भी दल जंगल के रास्ते शिकार खेलते हुए अपने-अपने गांवों की ओर निकल पड़े। विदाई के समय माहौल पूरी तरह से पारंपरिक ऊर्जा से भरा हुआ था।

कार्यक्रम में मुख्य उपस्थिति

इस ऐतिहासिक आयोजन को सफल बनाने में पड़हा व्यवस्था के कई दिग्गजों की भूमिका अहम रही। मौके पर मुख्य रूप से उपस्थित थे:

  • 12 पड़हा राजा: विशाल उरांव
  • 21 पड़हा राजा: महादेव कुजूर
  • पदाधिकारी: दीवान बिरवा खेस, डहरु उरांव, पड़हा प्रवक्ता चरवा उरांव।
  • सदस्य व गणमान्य: बंधना उरांव, बंदे उरांव, पीटर तिर्की, सुका महतो, मंगू पुजार, सोमरा पाहन, कोटवार मंगरु मुंडा, इंद्रजीत उरांव, सोमरा उरांव, रवि उरांव, मक्का उरांव, राजा चरवा उरांव और दीवान खद्दी उरांव।

इसके अलावा सभी पड़हा के महतो, पाहन, पुजार, कोटवार और भारी संख्या में पड़हा प्रेमी उपस्थित रहे।

निष्कर्ष

विशु शिकार केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अनुशासन, प्रकृति के साथ उनके जुड़ाव और उनकी प्रशासनिक व्यवस्था (पड़हा शासन) को प्रदर्शित करने का माध्यम है। ईटकी में संपन्न हुआ यह तीन दिवसीय आयोजन क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

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